तिथि कैसे ज्ञात करें
चंद्र की एक कला को तिथि कहते हैं। भचक्र में सूर्य और चंद्र की आपसी कोणीय दूरी 12डिग्री होती है, तो प्रथम तिथि का आरंभ होता है और जब सूर्य चंद्र भचक्र में परिभ्रमण करते आपस में 12 डिग्री के कोणीय अंतर में रहते हैं, तो प्रथम तिथि का अंत और द्वितीय तिथि का आरंभ होता है। इस तरह 0डिग्री-12डिग्री तक प्रथम, 12डिग्री-24डिग्री तक द्वितीया 24डिग्री-36डिग्री तक तृतीया … 168डिग्री-180डिग्री तक पूर्णिमा, पूर्णिमा के बाद 180डिग्री-192डिग्री तक फिर प्रथम तिथि और क्रमशः 348डिग्री-360डिग्री तक अमावस्या होती है।
इस तरह से एक माह में 30 तिथियां होती हैं और दो पक्ष 1 अमावस्या के अंत से पूर्णिमा के अंत तक शुक्ल पक्ष और पूर्णिमा के अंत से अमावस्या के अंत तक कृष्ण पक्ष कहलाता है।
तिथि जानने का सूत्र इस प्रकार है:
चंद्र के भोगांश – सूर्य के भोगांश/12 डिग्री
12 डिग्री का भाग देने पर यदि भाग फल 15 से कम आता है, तो कृष्ण पक्ष माना जाता है। भाग फल 15 से अधिक आने पर भाग फल को 15 से घटा दें और एक जोड़ दें, तो कृष्ण पक्ष की तिथियाँ ज्ञात होंगी।
यदि भाग फल 15 से कम है, तो भागफल में एक जोड़ने पर तिथियां ज्ञात होंगी।
तिथियों के नाम
Ûप्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी , दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा एवं अमावस्या।
तिथियों के प्रकार
नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता , पूर्णा एवं पक्षरन्ध्र संज्ञक तिथियाँ होती हैं।
नन्दा- प्रतिपदा, षष्ठी एवं एकादशी (1, 6,11) तिथियाँ नन्दा हैं।
भद्रा- द्वितीया, सप्तमी, एवं द्वादशी (2, 7, 12) तिथियाँ भद्रा हंै।
जया- तृतीया, अष्टमी एवं त्रयोदशी (3, 8, 13) तिथियाँ जया हैं।
रिक्ता – चतुर्थी, नवमी एवं चतुर्दशी (4, 9, 14) तिथियाँ रिक्ता हैं।
पूर्णा- पंचमी, दशमी एवं पूर्णिमा (5, 10, 15) तिथियाँ पूर्णा हंै।
पक्षरन्ध्र- चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी एवं चतुर्दशी (4, 6, 8, 9, 12, 14) तिथियाँ पक्षरन्ध्र हंै।
शुक्ल पक्ष की प्रथम पांच तिथियों को अशुभ माना जाता है, क्योंकि चंद्र निर्बल रहता है। आगामी पांच तिथियों को मध्यम फलदायी और अंतिम पांच को विशेष लाभकारी माना जाता है। इसी प्रकार कृष्ण पक्ष की प्रथम पांच विशेष शुभ, आगामी पांच मध्य लाभकारी और अंतिम पांच अशुभ मानी जाती हैं।
रिक्ता तिथियाँ प्रायः अशुभ मानी जाती हैं।
क्षय तिथियां: जो तिथि सूर्य उदय के उपरांत शुरू हो और अगले दिन के सूर्य उदय से पहले समाप्त हो जाय, उसे क्षय तिथि कहते हैं। क्षय तिथि भी शुभ कार्य के लिए अशुभ मानी जाती है। इसलिए क्षय तिथि में कोठे का शुभ मुहूर्त नहीं निकाला जाता।
वृद्धि तिथि: जो तिथि सूर्य उदय होने से पहले शुरू हो और अगले दिन सूर्य उदय होने के उपरांत समाप्त हो उसे वृद्धि तिथि माना जाता है। वृद्धि तिथि में भी शुभ मुहूर्त नहीं होता है।
पड़वा तिथियां: यदि कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्थी, अमावस्या और पूर्णिमा तिथियां संक्रांति के दिन आयें तो उन्हें पड़वा तिथियां कहते हैं। पड़वा तिथियों में भी शुभ मुहूर्त नहीं होता है।
गलगरहा तिथियाँ: कृष्ण पक्ष की चतुर्थी और दोनों पक्षों की सप्तमी, अष्टमी, नवमी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावस्या और प्रथम तिथियों को गलगरहा तिथियाँ माना जाता है। इन तिथियों में उपनयन और विद्या के लिए शुभ मुहूर्त नहीं निकाले जाते।
दग्ध संज्ञक तिथियाँ
Û रविवार को द्वादशी तिथि दग्ध संज्ञक है।
Û सोमवार को एकादशी तिथि दग्ध संज्ञक है।
Û मंगलवार को पंचमी तिथि दग्ध संज्ञक है।
Û बुधवार को तृतीया तिथि दग्ध संज्ञक है।
Û गुरुवार को षष्ठी तिथि दग्ध संज्ञक है।
Û शुक्रवार को अष्टमी तिथि दग्ध संज्ञक है।
Û शनिवार को नवमी तिथि दग्ध संज्ञक है।
इन तिथियों में कार्य करने से विघ्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
विष संज्ञक तिथियाँ
Û रविवार को चतुर्थी तिथि विष संज्ञक है।
Û सोमवार को षष्ठी तिथि विष संज्ञक है।
Û मंगलवार को सप्तमी तिथि विष संज्ञक है।
Û बुधवार को द्वितीया तिथि विष संज्ञक है।
Û गुरुवार को अष्टमी तिथि विष संज्ञक है।
Û शुक्रवार को नवमी तिथि विष संज्ञक है।
Û शनिवार को सप्तमी तिथि विष संज्ञक है।
इन तिथियों में कार्य करने से अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
हुताशन संज्ञक तिथियाँ
Û रविवार को द्वादशी तिथि हुताशन संज्ञक है।
Û सोमवार को षष्ठी तिथि हुताशन संज्ञक है।
Û मंगलवार को सप्तमी तिथि हुताशन संज्ञक है।
Û बुधवार को अष्टमी तिथि हुताशन संज्ञक है।
Û गुरुवार को नवमी तिथि हुताशन संज्ञक है।
Û शुक्रवार को दशमी तिथि हुताशन संज्ञक है।
शनिवार को एकादशी तिथि हुताशन संज्ञक है।
इन तिथियों में कार्य करने से विघ्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
दग्ध-विष-हुताशन योग संज्ञा बोधक चक्र
वार रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार शनिवार
दग्धा संज्ञक 12 11 5 3 6 8 9
विष संज्ञक 4 6 7 2 8 9 7
हुताशन संज्ञक 12 6 7 8 9 10 11